आराम का नशा

प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य और सत्य उसके अनुयायिओं द्वारा उसकी रक्षा करने का दृढ़ निश्चय और उसके प्रति समर्पण के द्वारा ही सार्वभौमिक पहचान और निश्चलता प्राप्त करता है। जिन लोगों ने उस कार्य और सत्य को स्वीकार किया है यदि वे ज्ञानविषयक, विश्वासपात्र और निरंतर प्रयत्नशील और दृढ़ नहीं हैं तो कार्य समय के साथ उसके दृढ़ संकल्प शत्रु के शत्रुता के कारण मानव मस्तिष्क् से मिट जाएगा।

वे आलसी लोग जो स्वयं को आराम पंसद बना लेते हैं वे सड़ना आरंभ कर देते है और पराजित बन जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे रूका हुआ पानी अपनी तरलता और जीवन का स्रोत खोकर दुर्गंधयुक्त हो जाता है। आराम की इच्छा पहली चेतावनी और मृत्यु का सूचक है। वैसे जिनकी संवेदनशीलता मर चुकी है वे उस चेतावनी को नहीं सुन सकते या उस सूचना को नहीं समझ सकते और मित्रों की सलाह और चेतावनी पर ध्यान नहीं देते।

आलस और आराम के प्रति आसक्ति मान मर्दन और अधिकार हनन के मुख्य कारणों में से एक है। निष्क्रिय लोग जिन्होने स्वयं को आराम (अकर्मण्यता) के हवाले कर दिया है वे एक दिन इतना नीचे गिर जाएंगे कि अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की आशा भी दूसरों से करेंगे।

एक बार उस अकर्मण्य आराम की आदत के साथ, घर बैठे रहते की आदत भी जुड़ जाए तो वे मैदान छोड़कर कायर बन जाते हैं। यदि इस पतन को नहीं पहचाना गया और स्थिति को बुद्धिमत्ता के साथ ठीक प्रकार से नहीं संभाला गया तो परिणाम विनाशकारी और वीभत्स होगा।

जो लोग अपनी आराम की आदत या अपने घर के मोह के कारण मैदान छोड़ देते हैं वे अक्सर अपनी आशा के विपरीत स्थिति से गुजरते है। वे अपने सुंदर घर और प्यारे बच्चों को भी खो सकते हैं। एक मां को अपने पुत्र-जो एक कमांडर था और उसने वीरता से युद्ध नहीं किया, जो उसे करना चाहिए था-को ये कहना कितना सच है कि “तुम युद्ध के मैदान में मर्द की तरह नहीं लड़े तो अब एक औरत की तरह बैठकर रोओ!”

एक मनुष्य के लिए परिवर्तन और क्षय सामान्यतः मंद और मूक प्रक्रिया है। कभी कभी एक छोटी सी भी लापरवाही, “कारवां” से हल्का सा भी भटकाव पूर्ण क्षति और पूर्ण नाश का कारण होता है। वैसे, क्योंकि जो गिरे हैं वे स्वयं को उसी जगह उसी स्थिति में पाते हैं, तो समझ नहीं पाते कि वे मिनार की तरह ऊँचाई स गहरे कूएं के तल में गिर गए हैं।

कुछ लोग जो परिश्रम और संघर्ष का मार्ग अपराधबोध की भावना के साथ छोड़ देते है, जो कि प्रत्येक भगोड़ और कर्तव्य त्यागी निश्चय ही छोड़ता है, वे स्वयं को सही ठहरायेंगे और उनके मित्र जो उस कार्य में लगे हुए हैं उनकी आलोचना करेंगे। ऐसे लोगों के लिए पथभ्रष्टता से बच पाना और मुख्यधारा में वापस लौटना लगभग असंभव है। पैगम्बर आदम, उन्हें शांति प्रदान हो, अपनी पूर्व स्थिति- जब वे भुलक्कड़पना में गिर गए थे- से एक ही कर्म के साथ बाहर आए और वो था अपनी गलती को स्वीकार करना। इसके विपरीत शैतान ने अपने पाप की गंभीरता के बाद भी स्वयं को बचाने की कोशिश की और अनंत कुंठा से घिर गया।

जिन लोगों ने अपने संकल्प, आत्मबल और प्रयास को छोड़ दिया है वे अपने आस पास के लोगों की हिम्मत और समर्पण की शक्ति को प्रभावित करते हैं। कभी-कभी किसी के द्वारा दिखाई गई एक छोटी सी झिझक या थोड़ी सी विमुखता लोगों को सौ लोगों की मृत्यु के बराबर का आघात और निराशा पहुंचा सकती है। ऐसी विपदा केवल राष्ट्र के शत्रुओं को आक्रमण के लिए बढ़ावा देती है।

बच्चों, परिवार और सांसारिक संपदा का आर्कषण मात्र एक सम्मोहन है और एक कष्टकारक अनुभव है। ऐसे अनुभव से सफलतापूर्वक बाहर निकलने वाले वे भाग्यशाली प्रतिवादी हैं जो संकल्पयुक्त, दृढ़ आत्मबल युक्त है जो प्रत्येक सुबह और शाम उस सत्य, जिसके प्रति स्वयं को समर्पित किया है, के साथ जुड़े रहने के अपने संकल्प को हृदय की गहराई से दोहराते है।

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