बच्चों का पालन पोषण

प्रत्येक व्यक्ति का भविष्य उसके बाल्यकाल में प्राप्त किए हुए संस्कार और प्रभावों से जुड़ा होता है। यदि बच्चे और युवा लोग ऐसे वातावरण में बड़े हुए होते है जहाँ उनका उत्साह उच्च विचारों से प्रेरित होता है तो वे ओजस्वी होते है और अच्छे नैतिक मूल्यों और गुणों को प्रदर्शित करते है।

सांस्कृतिक मूल्यों को सिखाने में बहुत कम महत्व और ध्यान दिया जाता है, यद्यपि वे शिक्षा के महत्वपूर्ण तत्व है। यदि हम इसको आवश्यक महत्व दे तो एक बड़े लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे।

एक समाज का विकास तभी संभव है जब युवा पीढ़ी को मानवता के स्तर तक ऊपर उठाया जाए, ना कि बुरे लोगो को नष्ट किया जाए। बुरे लोगो के नाश के स्थान से बुरे तत्व तब तक पनपते और बढ़ते रहेंगे जब तक कि पूरे देश में धर्म, परंपरा और ऐतिहासिक चेतना का बीज अंकुरित ना हो जाए।

बाल्य साहित्य, चाहे वो गद्य हो या पद्य, आत्मा को दृढ़ता, मस्तिष्क को शांति और आशाओं को मजबूती प्रदान करने वाला होना चाहिए, जिससे हम दृढ़ इच्छा शक्ति और सृदृढ़ विचारों वाली पीढ़ी का निर्माण कर सकें।

शिक्षा प्रदान करने वाले, जो अपने प्रशिक्षण कार्य में प्रवीण नहीं है और उन्होंने अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं की है, वे लोग ऐेसे नेत्रहीनों की तरह है जो लालटेन से दूसरों के मार्ग को प्रकाशित करने की कोशिश कर रहे है। एक बालक में शरारत और धृष्टता उस वातावरण से आती है जिसमें उसका पालन पोषण हुआ है। एक त्रुटिपूर्ण पारिवारिक जीवन बालक की आत्मा को बुरी तरह प्रभावित करता है जो समाज को प्रभावित करता है।

विद्यालयों में अच्छे आचरण को भी दूसरे विषयों के समान ही महत्व दिया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा तो बच्चों में कैसे अच्छे चरित्र का विकास होगा? शिक्षा और शिक्षण में अंतर है। बहुत से लोग शिक्षक हो सकते हैं लेकिन सच्ची शिक्षा प्रदान करने वाले बहुत ही कम लोग हैं।

अच्छा आचरण एक ऐसा गुण है जो जिसमें भी मिलता है उसकी बहुत सराहना होती है। अच्छे आचरण के लोग यदि अशिक्षित है तो भी पसंद किए जाते हैं। अच्छे आचरण के लोग यदि अशिक्षित है तो भी पसंद किए जाते हैं। संस्कार और शिक्षारहित समाज ऐसे असभ्य व्यक्ति की तरह है जिसमें मित्रता के लिए निष्ठा और शुत्रता के लिए कोई दृढ़ता नहीं दिखती। जो ऐसे व्यक्तियों पर भरोसा करते है उन्हें निराशा ही मिलती है और अगर उन पर आश्रित हो जाए तो वे कभी भी साथ छोड़ देते है।

यद्यपि लड़कियों का पालन पोषण एक फूल सी नाजुकता से करना मूलभूत है। वे बच्चों के लिए कोमल और प्यार भरा शिक्षक होती हैं। लेकिन साथ ही उन्हें सत्य की रक्षा के लिए दृढ़ भी बनाना चाहिए। अन्यथा हम उन्हें कोमलता और नाजुकता के नाम पर बेचारी और निष्क्रिय बना देंगे। हमें नहीं भूलना चाहिए कि शेरनी भी स्त्री है लेकिन फिर भी है तो वो शेरनी ही।

हमारी मानवता हमारी भावनाओं की समानुपाती है। यद्यपि वे लोग जो बुरी भावनाओं से भरे हैं और जिनकी आत्मा घमंड से प्रभावित है वे भले ही दिखते इंसान जैसे है लेकिन उनके इंसान होने में संशय है। लगभग सभी लोग अपने शरीर को प्रशिक्षित कर सकेत हैं। शरीर को प्रशिक्षित करके सुदृढ़ बना सकते हैं लेकिन मन को शिक्षित करके आध्यात्मिक लोगों का निर्माण होता है।

एक बच्चा जिसकी आत्मा शीशे की तरह साफ और कैमरे की तरह शीघ्र रिकार्ड करने वाली होती है। उसका पहला विद्यालय उसका घर होता है। उनकी पहली शिक्षक उनकी माँ होती है। इसीलिए किसी राष्ट्र के अस्तित्व और स्थायीत्व के लिए ये मूलभूत है कि माँ का पालन पोषण ऐसा हो कि वो अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षक बन सके।

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